“मौत का गटर: आधुनिक भारत में अब भी इंसानों से क्यों कराई जा रही है सीवर सफाई?”आंकड़ों के अनुसार 2019 से 2024 के बीच 10 से अधिक मौतें दर्ज

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रायपुर/छत्तीसगढ़:देश डिजिटल हो रहा है, शहर स्मार्ट सिटी बन रहे हैं, और तकनीक हर क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रही है। लेकिन इसी आधुनिक भारत में एक कड़वी सच्चाई अब भी जिंदा है—सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई आज भी इंसानों से कराई जा रही है, और वह भी बिना सुरक्षा के।यह सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि हर बार मौत के मुंह में उतरने जैसा जोखिम है।

कानून क्या कहता है, और जमीन पर क्या हो रहा है?

भारत सरकार ने 2013 में “मैनुअल स्कैवेंजिंग” पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था। इसके तहत किसी भी व्यक्ति को सीवर या सेप्टिक टैंक में बिना सुरक्षा उपकरणों के उतारना गैरकानूनी है।सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि—- ऐसी मौतों पर न्यूनतम ₹10 लाख मुआवजा दिया जाए- जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो ,लेकिन छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में यह कानून कागजों तक ही सीमित नजर आता है।

छत्तीसगढ़ की स्थिति: आंकड़ों में सच्चाई राज्य में पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मजदूरों की मौत हुई।उपलब्ध रिपोर्ट्स और मीडिया आंकड़ों के अनुसार:- 2019 से 2024 के बीच 10 से अधिक मौतें दर्ज- ज्यादातर मामलों में – मजदूरों के पास कोई सुरक्षा उपकरण नहीं था – काम ठेके पर दिया गया था – हादसे के बाद जिम्मेदारी तय नहीं हो सकी।यह आंकड़े भले छोटे लगें, लेकिन हर संख्या के पीछे एक परिवार की पूरी दुनिया खत्म हो जाती है।

देशभर में स्थिति और भी गंभीर राष्ट्रीय स्तर पर तस्वीर और भी डरावनी है:- 2013 के बाद से अब तक 1000 से ज्यादा मौतें- हर साल औसतन 50 से अधिक सफाईकर्मी अपनी जान गंवाते हैं- 90% मामलों में मजदूर बिना किसी सुरक्षा उपकरण के सीवर में उतरे—सबसे बड़ा कारण: ठेकेदारी सिस्टम इस समस्या की जड़ में सबसे बड़ा कारण है—ठेकेदारी मॉडल- नगर निगम या संस्थाएं काम ठेके पर देती हैं- ठेकेदार लागत बचाने के लिए सुरक्षा उपकरण नहीं देते- हादसा होने पर जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल दी जाती है,इस पूरे सिस्टम में सबसे कमजोर कड़ी होता है मजदूर, जिसकी आवाज कहीं नहीं सुनी जाती।—तकनीक होने के बावजूद इंसान क्यों?आज सीवर सफाई के लिए- हाई-प्रेशर जेटिंग मशीन- सक्शन मशीन- रोबोटिक क्लीनिंग सिस्टम जैसी तकनीक उपलब्ध है।फिर भी उनका उपयोग सीमित क्यों है?

विशेषज्ञों के अनुसार:- मशीनें खरीदने और चलाने में खर्च- छोटे शहरों में संसाधनों की कमी- निगरानी और जवाबदेही का अभाव—मानवाधिकार का सवाल यह मुद्दा सिर्फ सफाई का नहीं, बल्कि मानवाधिकार और गरिमा का है।जो लोग समाज की सफाई करते हैं,उन्हें ही सबसे असुरक्षित और उपेक्षित हालात में काम करना पड़ता है।—सरकार और सिस्टम के सामने बड़े सवाल- क्या मैनुअल स्कैवेंजिंग सच में खत्म हो चुकी है?- मशीनों के बावजूद इंसानों को क्यों उतारा जा रहा है?- हर मौत के बाद जिम्मेदार कौन तय करेगा?- क्या सिर्फ मुआवजा देना ही समाधान है?—निष्कर्ष:भारत विकास के नए आयाम छू रहा है, लेकिन अगर एक मजदूर को आज भी बिना सुरक्षा के सीवर में उतरना पड़ता है, तो यह विकास अधूरा है।जब तक सिस्टम जवाबदेह नहीं होगा,और तकनीक को जमीन पर लागू नहीं किया जाएगा,तब तक “मौत का यह गटर” यूं ही जिंदगियां निगलता रहेगा।—

(यह रिपोर्ट समाज के उस वर्ग की आवाज उठाने का प्रयास है, जो अक्सर नजरों से दूर रहता है, लेकिन जिसकी मेहनत पर शहर खड़े हैं।)

Anuj Mishra  के बारे में
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